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वक़्त बहुत हैं पर

वक़्त बहुत है , रिश्तों की बारीकियाँ समझने का ,

पर अफ़सोस ,समझ कर निभा सकते नहीं- अभी। 

दोस्तों संग बैठे,गप्पे मारें, बहुत है मन ,

पर, द्वार सभी है बंद , न खोल सकते , न खुलवा सकते -अभी।।

वक़्त बहुत है, अमीरों को चिंता , खर्च को कहाँ जाएँ?

गरीबों को चिंता , खर्चे कहाँ से लाएँ -अभी।

कोरोना का जिन्न, दोनों हैं खिन्न , हुआ बुरा हाल

एक खा-खाके सोता , एक बिना खाये रोता,हाल है बेहाल- अभी।।

वक़्त बहुत है,दुनियाँ घुमूं, मन मैं ख्वाहिश खूब है

पर अफ़सोस , ख्वाहिश खामोश हैं , बंदीश हीं बंदीश -अभी।

बंदीश भी ऐसी, कयामत सी क्रांति ,गांव- शहर  घर-आँगन मर घट सी शांति ,

ऐसे में अपनों का खोना है खलता , चार कदम साथ नहीं और भी अखरता -अभी।।

वक़्त बहुत है, हुआ प्रसारित , रामायण – महाभारत फिर से ,

रामायण की कथा-व्यथा तो , जन-मानस की कथा -व्यथा सी लगी आज भी।

महाभारत के कुरुक्षेत्र में, कौरव-पांडव युद्ध विषय भी ,

अनाचार पर सदाचार की जय प्रमाण है , आज अभी -भी ||

वक़्त बहुत हैं पर अभी-भी …..।। 

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